जमुई(बिहार). Herbal Gulal: के जमुई जिले के लक्ष्मीपुर प्रखंड में स्थित नेचर विलेज मटिया ने नारी सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक नई मिसाल कायम की है। यहां की महिलाएं हर्बल गुलाल बनाकर आत्मनिर्भर बन रही हैं और अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत बना रही हैं।
हर्बल गुलाल का उत्पादन
नेचर विलेज मटिया में हर्बल गुलाल का उत्पादन किया जाता है। इस गुलाल में पालक, चुकंदर, संतरा, और गेंदा फूल जैसे प्राकृतिक अवयवों का उपयोग किया जाता है। पालक और अन्य पत्तियों से हरा रंग, संतरा और गेंदा फूल से नारंगी रंग का गुलाल तैयार होता है।
महिलाओं की भूमिका
नेचर विलेज मटिया में महिलाएं हर्बल गुलाल के उत्पादन में सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं। वे गुलाल के उत्पादन में अपना योगदान दे रही हैं और अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत बना रही हैं।
आर्थिक लाभ
नेचर विलेज मटिया में हर्बल गुलाल के उत्पादन से महिलाओं को आर्थिक लाभ हो रहा है। वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत बना रही हैं और अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा प्रदान कर रही हैं।
पर्यावरण के अनुकूल
नेचर विलेज मटिया में हर्बल गुलाल का उत्पादन पर्यावरण के अनुकूल है। इस गुलाल में कोई भी हानिकारक रसायन नहीं होता है, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक हो सकता है। नेचर विलेज मटिया में हर्बल गुलाल का उत्पादन एक अच्छी पहल है। यह न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बना रहा है, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी है। यह पहल नारी सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक अच्छा कदम है।
नेचर विलेज मटिया की सफलता
नेचर विलेज मटिया की सफलता का श्रेय महिलाओं की मेहनत और समर्पण को जाता है। उन्होंने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने के लिए हर्बल गुलाल का उत्पादन शुरू किया और आज वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत बना रही हैं।
सरकार का समर्थन
नेचर विलेज मटिया को सरकार का समर्थन भी मिल रहा है। सरकार ने महिलाओं को हर्बल गुलाल का उत्पादन शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की है और उन्हें अपने उत्पादों को बाजार में बेचने के लिए भी समर्थन किया है।
150 क्विंटल हर्बल गुलाल बनाने का लक्ष्य
होली का त्योहार रंगों का प्रतीक है, लेकिन पारंपरिक रंगों में मिलने वाले हानिकारक केमिकल सेहत और पर्यावरण के लिए खतरनाक साबित होते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए, नेचर विलेज मटिया की महिलाओं ने पूरी तरह से प्राकृतिक अवयवों से तैयार हर्बल गुलाल बनाने की एक अनूठी पहल शुरू की है। इस वर्ष 150 क्विंटल हर्बल गुलाल का उत्पादन करने का लक्ष्य रखा गया है, जो पिछले साल के 6-8 क्विंटल उत्पादन की तुलना में एक बड़ी वृद्धि है।
इस कार्य में जुड़ी महिलाओं ने बताया कि गुलाल बनाने के लिए पालक, चुकंदर, संतरा और गेंदा फूल जैसे प्राकृतिक अवयवों का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए:
- पालक और अन्य हरी पत्तियों से हरा रंग बनाया जाता है।
- संतरा और गेंदा फूल से नारंगी रंग तैयार किया जाता है।
- चुकंदर से गुलाबी और लाल रंग का गुलाल विकसित होता है।
एक रंग का गुलाल तैयार करने में दो दिन का समय लगता है। इस परियोजना में नेचर दीदी नामक महिला समूह सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है, जिससे ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक स्थिरता मिल रही है और वे आत्मनिर्भर बन रही हैं।
हर्बल गुलाल को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने की योजना
नेचर विलेज मटिया के संस्थापक और संरक्षक, लक्ष्मीपुर के पूर्व अंचलाधिकारी निर्भय प्रताप सिंह ने बताया कि यहां तैयार गुलाल 100% केमिकल-फ्री है, जो स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि इस बार जिले में ‘प्रकृति होली’ मनाई जाएगी, जिसका मुख्य केंद्र नेचर विलेज मटिया होगा। इस होली में केवल हर्बल रंगों का उपयोग किया जाएगा, जिससे यह पर्व पर्यावरण के अनुकूल और स्वस्थ होगा।
इसके अलावा, हर्बल गुलाल को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने की योजना बनाई गई है। इस बार आकर्षक पैकेजिंग के साथ गुलाल को विभिन्न ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, बड़े बाजारों और एक्सपोर्ट सेक्टर तक ले जाया जाएगा। इससे न केवल ग्रामीण महिलाओं को एक सशक्त मंच मिलेगा, बल्कि प्राकृतिक और जैविक उत्पादों को भी बढ़ावा मिलेगा।
बाजारों में नेचर विलेज मटिया के बनाए रंगों की भारी मांग
नेचर विलेज मटिया की यह पहल आत्मनिर्भर भारत, जैविक उत्पादों के संवर्धन और सुरक्षित होली के लिए एक शानदार उदाहरण बन रही है। यह न केवल जिले का गौरव बढ़ा रहा है, बल्कि समाज और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभा रहा है।
फिलहाल, सभी महिलाएं होली के लिए हर्बल गुलाल तैयार करने में जुटी हुई हैं। जिला भर के बाजारों में नेचर विलेज मटिया द्वारा बनाए गए हर्बल रंगों की जबरदस्त मांग है। स्थानीय व्यापारी और उपभोक्ता रासायनिक रंगों की बजाय हर्बल रंगों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे यह पहल और भी सफल होती जा रही है।
सतत विकास और महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम
नेचर विलेज मटिया का यह अभियान केवल हर्बल गुलाल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का एक सफल मॉडल बन रहा है। इस पहल के तहत:
- महिलाओं को रोजगार मिल रहा है, जिससे वे आत्मनिर्भर बन रही हैं।
- रासायनिक रंगों के उपयोग में कमी आ रही है, जिससे पर्यावरण को फायदा हो रहा है।
- स्थानीय जैविक उत्पादों की मांग बढ़ रही है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल रहा है।
- प्राकृतिक रंगों के उपयोग से होली का त्योहार और भी सुरक्षित और आनंदमय बन रहा है।
नेचर विलेज मटिया: आत्मनिर्भरता और पर्यावरण-संवेदनशीलता का प्रतीक
परिचय:
बिहार के जमुई जिले के लक्ष्मीपुर प्रखंड में स्थित नेचर विलेज मटिया एक ऐसा अग्रणी गांव है, जिसने आत्मनिर्भरता और पर्यावरण-संवेदनशीलता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। यह गांव ग्रामीण विकास और सतत आजीविका का एक बेहतरीन उदाहरण बन चुका है, जहां पारंपरिक और आधुनिक तकनीकों का समन्वय कर स्थानीय समुदाय को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जा रहा है।
महिला सशक्तिकरण और आजीविका के साधन
नेचर विलेज मटिया की सबसे बड़ी विशेषता यहां की महिलाओं का स्वावलंबन है। यहां की महिलाएं विभिन्न कुटीर उद्योगों में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- हर्बल गुलाल निर्माण – पूरी तरह से प्राकृतिक अवयवों से निर्मित रंग, जो पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित हैं।
- मसाला उत्पादन – जैविक मसालों का निर्माण, जो बाजार में उच्च गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध हैं।
- सिलाई और कढ़ाई – महिलाओं के लिए रोजगार का एक प्रमुख स्रोत, जिससे वे आत्मनिर्भर बन रही हैं।
- हस्तशिल्प और अन्य कुटीर उद्योग – जिसमें जैविक उत्पाद, घरेलू सजावट और अन्य हस्तनिर्मित सामान शामिल हैं।
इन उद्योगों के माध्यम से न केवल महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है, बल्कि उन्होंने स्वरोजगार के नए अवसर भी प्राप्त किए हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और वे अपने परिवारों की आर्थिक रीढ़ बन सकी हैं।
समग्र विकास के लिए 15 सूत्रीय कार्यक्रम
गांव के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करने के लिए नेचर विलेज मटिया में 15 सूत्रीय कार्यक्रम लागू किए गए हैं, जिनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं:
- स्वच्छता अभियान – पूरे गांव में स्वच्छता बनाए रखने के लिए नियमित सफाई अभियान चलाए जाते हैं।
- शिक्षा के लिए जागरूकता – बच्चों और वयस्कों दोनों के लिए शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है।
- जैविक कृषि – रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बजाय जैविक खेती को प्राथमिकता दी जा रही है।
- पौधरोपण अभियान – पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़े पैमाने पर पौधरोपण किया जा रहा है।
- नारी सशक्तिकरण – महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
- योग और स्वास्थ्य जागरूकता – लोगों को योग और प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति जागरूक किया जा रहा है।
- पुनर्नवीनीकरण और कचरा प्रबंधन – गांव में कचरे को रिसाइकिल कर उपयोगी वस्तुएं बनाई जा रही हैं।
- सौर ऊर्जा का उपयोग – नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।
- पशुपालन और दुग्ध उत्पादन – ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए डेयरी फार्मिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
- स्थानीय कुटीर उद्योगों का संवर्धन – जैविक और हस्तनिर्मित उत्पादों के निर्माण और विपणन पर ध्यान दिया जा रहा है।
इस कार्यक्रम के तहत गांव के लोग पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास और आत्मनिर्भरता को अपनाकर अपने जीवन स्तर को बेहतर बना रहे हैं।
नेचर विलेज मटिया: राज्य का मॉडल गांव
नेचर विलेज मटिया की इन पहलों ने इसे न केवल जमुई जिले में बल्कि पूरे बिहार राज्य में एक मॉडल गांव के रूप में स्थापित किया है। यहां पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों के निर्माण के साथ-साथ, सामाजिक और आर्थिक विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
यह गांव स्वावलंबी भारत के दृष्टिकोण को साकार करने की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण बन रहा है, जहां ग्रामीण समुदाय प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग, स्थानीय उत्पादों के संवर्धन और महिला सशक्तिकरण के माध्यम से एक नई पहचान बना रहा है।
नेचर दीदी और नेचर भैया – आत्मनिर्भरता की मिसाल
नेचर विलेज मटिया की सबसे अनूठी विशेषताओं में से एक यहां के ग्रामीणों को “नेचर दीदी” और “नेचर भैया” के नाम से मिली पहचान है। यह न केवल एक उपाधि है, बल्कि पर्यावरण-संवेदनशीलता, आत्मनिर्भरता और सामाजिक उत्थान का प्रतीक भी है। इस पहचान ने गांव के लोगों को एक नई प्रेरणा दी है, जिससे वे अपने कौशल और मेहनत के बल पर आर्थिक रूप से सशक्त बन रहे हैं और पर्यावरण को भी सुरक्षित रख रहे हैं।
